हम जिंदा हैं क्योंकि दो जून की रोटी है… इश्क की वजह भी और हिंसा का कारण भी! – आज तक

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देश के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेजों में शुमार Imperial College of Engineering के निदेशक वीरू सहस्त्रबुद्धे कहते हैं, ‘लाइफ इज अ रेस… अगर तेज नहीं भागोगे तो कोई तुम्हें कुचल कर आगे निकल जाएगा.’ वीरू सहस्त्रबुद्धे का दर्शन कहता है कि हर कोई सिर्फ पहले नंबर पर आने वाले को याद रखता है, नंबर दो को कोई याद नहीं रखता. लेकिन बिहार में जन्मे ‘राइट टू एजुकेशन’ के उभरते चेहरे, सरकार से शिक्षा मांगते और पूंजीवादी एजुकेशन सिस्टम से कॉम्प्रोमाइज करते मीम्म की दुनिया के सेंसेशन आदरणीय सोनू जब कहते हैं कि ‘अपने देश को नंबर टू पर ले जाएंगे’, तो ICE के निदेशक का दर्शन छोटा पड़ा जाता है. 
भारत में हम सिर्फ पहले नंबर को नहीं बल्कि नंबर दो को भी सेलिब्रेट करते हैं. जैसे- 2 अक्टूबर की छुट्टी, दो नंबर का पैसा, चुनाव में दूसरे नंबर पर आने वाली पार्टी, दोयम दर्जे का नागरिक, दोगला दोस्त, दोमुंहा सांप, डबल इंजन की सरकार, 1953 में आई फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ वगैरह-वगैरह. इन्हीं जोड़ों में आती है तारीख. आज की तारीख. 2 जून की तारीख.
दो जून सिर्फ एक तारीख नहीं बल्कि एक मुकम्मल मुहावरा है, जिसका अर्थ है जीवन यापन के लिए आवश्यक न्यूनतम भोजन या जीविका चलाने भर की आमदनी. हालांकि रोटी के लिए एक तारीख फिर भी है, अभागे पराठों या पूड़ियों के हिस्से किसी महीने की कोई तारीख नहीं आई. ‘रोटी’ का इस्तेमाल एक प्रतीक के रूप में भी किया जाता है. ‘भोजन’ को सिर्फ ‘रोटी’ कह देना, रोटी के महत्व को कई गुना बढ़ा देता है. 
मशहूर खाद्य समीक्षक पुष्पेश पंत कहते हैं कि,
‘इंसान की दो मूलभूत जरूरतें होती हैं, पहला भोजन और दूसरा संभोग. हालांकि संभोग की इच्छा एक आयु के बाद जाग्रत होती है और एक उम्र के बाद सिर्फ हरसतें रह जाती हैं लेकिन भोजन का संबंध हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक है. चाहे नवजात को मां का पहला दूध पिलाना या शहद चटाना हो या मृत्यु के बाद मुख में तुलसीदल डालना.’
रोटी के साथ नमक और सरसों का तेल या घी खाने का दावा करके शहरों में बुजुर्ग अपनी जड़ों को याद करते हैं. सेल्फ-प्रोक्लेम्ड कुंवारे कुकों के लिए आज भी रोटी बनाना एक ऐसी चुनौती है जिससे वो हर रोज पार पाने की नाकाम कोशिश करते रहते हैं. अनजान पापों का आरोप झेलने वाले पेट और दो जून की रोटी में ही वो ताकत है जो हर रोज खींच लाती है लोगों को दफ्तरों की ओर. और फिर इस समाज ने उस युग में भी कदम रखा जहां लोगों ने यह कहकर छोड़ दी रोटी कि ‘ग्लूटन इज नॉट गुड फॉर हेल्थ’.
‘दो जून की रोटी’ हर काल में प्रासंगिक रही. 1979 में शशि कपूर और नरगिस की एक फिल्म आई थी- ‘दो जून की रोटी’. सिनेमा ने हमें बताया कि ‘दो जून की रोटी’ सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं बल्कि सम्मान और अस्तित्व के संघर्ष का प्रतीक भी है. कई कवियों और लेखकों ने अपनी रचनाओं में ‘दो जून की रोटी’ का संदर्भ लेते हुए ‘भूख’ और ‘रोटी’ का जिक्र किया है.
सर्वेश्वरदयाल सक्सेना ने अपनी कविता ‘भूख’ में लिखा,
जब भी
भूख से लड़ने
कोई खड़ा हो जाता है
सुंदर दिखने लगता है

परसाई जी लिखते हैं, 
‘कुत्ते भी रोटी के लिए झगड़ते हैं, पर एक के मुंह में रोटी पहुंच जाए जो झगड़ा खत्म हो जाता है. आदमी में ऐसा नहीं होता.’
‘दो जून की रोटी’ के सबसे बड़े झंडाबरदार मुंशी जी रहे. उन्होंने कई उपन्यासों और कहानियों में इसका इस्तेमाल किया लेकिन अपने पात्रों को कभी दो जून की रोटी नहीं खिलाई. ‘गोदान’ का होरी हमें दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करता दिखता है. ‘कफन’ का तो पूरा बिम्ब ही रोटी और भूख के इर्द-गिर्द बुना गया है. और ‘पूस की रात’ का हल्कू दो जून की रोटी के लिए तरसता ही रह गया. जयशंकर प्रसाद का ‘छोटा जादूगर’ रोटी के लिए ही हमें करतब करता दिखता है.   
रोटी सिर्फ दो जून की नहीं होती. राजनीतिक रोटियां भी होती हैं, जिन्हें सेंकने के लिए एक विशेष किस्म की आग की आवश्यकता होती है. हाथ की बनी रोटी, रोटी मेकर से बनी रोटी, मेड की रोटी, मां के हाथ की रोटी, पिता के हाथ की दुर्लभ रोटी, नववधू के मेंहदी लगे हाथों की अतिरिक्त नर्म रोटी, गोल रोटी, बेगोल रोटी, गाय को खिलाने वाली रोटी, भीख में दी गई रोटी, ससुराल में मिली रोटी और मुफ्त की रोटी जिन्हें खाने से पहले तोड़ा जाता है. हर रोटी का स्वाद अलग होता है.  
दो जून की रोटी विपन्नता में मिला भोजन है और न्यूनतम संसाधनों में परम संतोष की प्राप्ति भी है. पलायन की वजह है. हिंसा का कारण है. किसी को खिलाना पुण्य है और किसी के हिस्से की छीनना अधर्म. शिक्षा का आधार है. युद्ध का कारण है. श्रृंगार की उत्पत्ति है. घरेलू हिंसा का कारण भी. दो जून की रोटी, दो मई या दो जुलाई को नहीं खाई जा सकती. बेहद संघर्ष और पूरी नारीत्व के साथ घुटन भरी रसोई में बनाई जाती है दो जून की रोटी. ज्योति रीता अपनी कविता ‘हम कीचड़ के कवि थे’ में लिखती हैं,
हम असभ्य और अशिष्ट लोग थे
हमें तन भर कपड़ा जी भर खाना कभी नहीं मिला
मिले चीथड़ों पर हम रोज़ कविताएं लिख रहे थे
हम दो जून की रोटी मुहैया करते-करते
कविताएं लिख रहे थे
एक बैल के मारे जाने पर
उनकी जगह खेत जोतने वाले लोग थे
हम लगातार खेतों में खड़े हो-होकर
कविताएं लिख रहे थे

अब कविताएं पक चुकी हैं
वे संसद पहुंचने के लिए तैयार हैं

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