होर्मुज बंद हुआ तो भी जलेगा आपके घर का चूल्हा, भारत के लिए इस देश ने खोल दिया LNG का खजाना – India.Com

Published By: Anjali Karmakar | Updated: Jul 23, 2026, 5:42 PM
मिडिल ईस्ट में चल रहे अमेरिका-इजरायल और ईरान की लड़ाई ने फिर से एनर्जी क्राइसिस बढ़ा दिया है. लगातार अमेरिकी हमलों के बाद ईरान ने कच्चे तेल और नैचुरल गैस की सप्लाई के सबसे अहम समुद्री रास्ते होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह से ब्लॉक कर दिया है. इसके बाद कई देश तेल और गैस की किल्लत से जूझ रहे हैं. इस संकट के बीच भारत के लिए बड़ी राहत की खबर आई है. दक्षिण-पूर्व एशिया के एक छोटे और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध देश ने भारत के लिए अपने तेल और गैस का खजाना खोल दिया है.
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण-पूर्व एशिया के देश तिमोर-लेस्ते (Timor-Leste) ने भारत को अपने यहां तेल, गैस, LNG, ऑयल रिफाइनिंग, शिक्षा और हेल्थकेयर जैसे क्षेत्रों में निवेश करने का खुला ऑफर दिया है. यह ऑफर ऐसे समय आया है, जब भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए मिडिल ईस्ट पर निर्भरता कम करने की कोशिश में है. भारत इसके लिए नए साझेदारों की तलाश कर रहा है. अगर तिमोर-लेस्ते के साथ ये पार्टनरशिप आगे बढ़ती है, तो यह सिर्फ व्यापारिक नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति को भी मजबूत कर सकती है.
तिमोर-लेस्ते के राष्ट्रपति जोस रामोस-होर्टा ने नई दिल्ली में भारतीय उद्योगपतियों और निवेशकों से मुलाकात की. इस दौरान रामोस-होर्टा ने खास तौर पर ऊर्जा, LNG, पेट्रोलियम रिफाइनिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और कृषि क्षेत्रों में भारतीय कंपनियों को निवेश का ऑफर दिया. तिमोर-लेस्ते के राष्ट्रपति ने कहा कि भारत के पास तकनीक, निवेश क्षमता और बड़े पैमाने पर औद्योगिक अनुभव है, जबकि तिमोर-लेस्ते के पास प्राकृतिक संसाधनों की भरपूर उपलब्धता है. ऐसे में दोनों देशों की साझेदारी दोनों के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकती है.
तिमोर-लेस्ते भले ही क्षेत्रफल और आबादी के लिहाज से छोटा देश हो, लेकिन प्राकृतिक गैस और तेल के भंडार इसे बेहद अहम बनाते हैं. इसकी अर्थव्यवस्था लंबे समय से पेट्रोलियम सेक्टर पर आधारित रही है. देश के पास अपतटीय (Offshore) तेल और गैस परियोजनाओं की बड़ी संभावनाएं हैं. तिमोर-लेस्ते इन संसाधनों के विकास के लिए विदेशी निवेश आकर्षित करना चाहता है.
भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा कच्चा तेल और बड़ी मात्रा में गैस इंपोर्ट करता है. ऐसे में अगर भारतीय कंपनियां तिमोर-लेस्ते के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करती हैं, तो कई फायदे हो सकते हैं. इस डील से तेल और गैस के नए सोर्स मिलेंगे. LNG सप्लाई को लेकर दीर्घकालिक समझौते हो सकते हैं. भारतीय कंपनियों को विदेशी ऊर्जा परियोजनाओं में हिस्सेदारी मिलेगी.भविष्य में ऊर्जा आयात के जोखिम कम किए जा सकेंगे. हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक मौजूदगी और मजबूत होगी. सिर्फ तेल-गैस ही नहीं, शिक्षा और हेल्थकेयर में भी मौका मिलेगा.
भारत और तिमोर-लेस्ते के संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं. भारत ने हाल के समय में वहां अपना दूतावास खोला है. दोनों देशों के बीच व्यापार, शिक्षा और तकनीकी सहयोग बढ़ा है. भारतीय कंपनियां पहले भी तिमोर सागर में तेल और गैस की खोज से जुड़ी परियोजनाओं में भाग ले चुकी हैं. भारत पहले से ही आईटी, शिक्षा और क्षमता निर्माण के क्षेत्र में तिमोर-लेस्ते के साथ काम करता रहा है. अब इन क्षेत्रों में निजी निवेश की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं.
भारत अगले दशक में अपने एनर्जी मिक्स में प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी लगभग 15% तक ले जाना चाहता है. इसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार और कंपनियां लंबी अवधि के LNG समझौतों पर फोकस कर रही हैं. लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट का सबसे बड़ा फायदा यह है कि भारत को हर बार महंगे स्पॉट मार्केट से LNG नहीं खरीदनी पड़ेगी. इससे वैश्विक कीमतों में अचानक उछाल का असर कुछ हद तक कम हो सकता है.
2025 में भारत दुनिया का सबसे बड़ा लॉन्ग टर्म LNG बायर्स बनकर उभरा. भारत ने एक साल में 8.4 मिलियन टन (MTPA) के LNG कॉन्ट्रैक्ट साइन किए. 2025 में 6 भारतीय कंपनियों ने लॉन्ग-टर्म LNG डील कीं. ये कंपनियां हैं- इंडियन ऑयल (IOC) – 4.7 MTPA, GAIL – 1 MTPA, गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (GSPC) – 1 MTPA, टोरेंट पावर– 0.69 MTPABPCL – 0.5 MTPA और HPCL. HPCL ने गैस की मात्रा सार्वजनिक नहीं की है. देश में अब 8 LNG इंपोर्ट टर्मिनल काम कर रहे हैं. LNG इंपोर्ट, स्टोरेज और री-गैसीफिकेशन क्षमता लगातार बढ़ाई जा रही है, ताकि भविष्य की मांग पूरी की जा सके.
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन लगातार अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. ऐसे में अगर भारत तिमोर-लेस्ते में बड़े पैमाने पर निवेश करता है, तो उसे ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ रणनीतिक बढ़त भी मिल सकती है. हालांकि, तिमोर-लेस्ते ने अपने निवेश प्रस्ताव को किसी एक देश के खिलाफ नहीं बताया है, लेकिन क्षेत्रीय भू-राजनीति के लिहाज से यह साझेदारी काफी अहम मानी जा रही है.
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