फेरे पूरे कागज अधूरे अधिकारों से वंचित कर सकती है बिना पंजीकरण की शादी – Live Hindustan

विष्णु बाजपेई, रायबरेली। शास्त्रों में विवाह को सात जन्मों का बंधन कहा गया है लेकिन कानून की नजर में यह बंधन तभी मान्य होता है जब उसका लिखित प्रमाण हो। सर्वोच्च न्यायालय ने भी बार-बार विवाह पंजीकरण पर जोर दिया है लेकिन रायबरेली जिले में स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। यहां हर साल तीस हजार से अधिक विवाह होते हैं जबकि पंजीकरण मात्र छह से सात सौ जोड़े ही कराते हैं। सीधे शब्दों में कहें तो सौ में से केवल दो विवाह ही पंजीकृत होते हैं और अट्ठानबे बिना किसी कानूनी दस्तावेज के अधूरे रह जाते हैं। जिले के चौंकाने वाले आंकड़े

वर्ष 2025 में रायबरेली के पैंतीस होटलों और तीस लॉन में तेरह सौ से अधिक शादियां हुईं जिनमें से केवल इकतालीस जोड़ों ने पंजीकरण कराया। ऊंचाहार में छह सौ शादियों में से तैंतीस, सलोन में पांच सौ में से इकतालीस और लालगंज में तीन हजार शादियों में से केवल पैंतीस लोगों ने विवाह पंजीकृत कराया। सरेनी, डलमऊ और महाराजगंज में तो स्थिति और भी दयनीय है जहां सैकड़ों शादियों के बावजूद पिछले साल मात्र पांच विवाह पंजीकृत हो सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस उदासीनता के पीछे सबसे बड़ा कारण प्रशासनिक निष्क्रियता है। जिले में कभी कोई जागरूकता अभियान नहीं चलाया गया। पंजीकरण के लिए दो गवाह, परिवार रजिस्टर की नकल, विवाह कार्ड और शैक्षिक प्रमाण पत्र सहित कई दस्तावेज अनिवार्य हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इन्हें जुटाना और ऑनलाइन प्रक्रिया पूरी करना बड़ी चुनौती है जिससे लोग पंजीकरण से दूरी बनाए रखते हैं।

पंजीकरण न होने का सबसे अधिक नुकसान महिलाओं को उठाना पड़ता है। वरिष्ठ अधिवक्ता धीरेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि आज सबसे अधिक शिकायतें धोखे से यौन शोषण की आती हैं जिनमें पहली शादी छिपाकर दूसरी महिला को विवाह का झांसा दिया जाता है। यदि विवाह पंजीकरण अनिवार्य हो और उसे सार्वजनिक पोर्टल पर अपलोड किया जाए तो ऐसी अस्सी प्रतिशत शिकायतें स्वतः समाप्त हो सकती हैं। इसके अलावा पति की मृत्यु की स्थिति में संपत्ति में कानूनी वारिस का दर्जा दिलाने में भी विवाह प्रमाण पत्र की भूमिका निर्णायक होती है। फॉरेन वीजा, पासपोर्ट और सेना से जुड़े मामलों में भी यह दस्तावेज अनिवार्य हो जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय में ऐसे कई मामले नजीर बन चुके हैं। वर्ष 2006 में सीमा बनाम अश्विनी कुमार के मामले में पत्नी ने पति पर बहुविवाह का दावा ठोका लेकिन स्वयं उसका विवाह पंजीकृत न होने से मामला जटिल हो गया। वर्ष 2013 में बादशाह बनाम उर्मिला के मामले में एक विवाहित युवक ने दूसरी महिला को प्रेमजाल में फंसाया और विवाह पंजीकृत न होने से धोखाधड़ी साबित करना कठिन हो गया। दोनों ही मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने सामाजिक न्याय को प्राथमिकता देते हुए पीड़ित महिलाओं के पक्ष में फैसला सुनाया और प्रत्येक विवाह के अनिवार्य पंजीकरण पर बल दिया। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि पंजीकरण न होने से बाल विवाह, बहुविवाह और धोखाधड़ी जैसे मामलों में सच्चाई साबित करना अत्यंत कठिन हो जाता है। फेरों के साथ कागजों का पूरा होना न केवल कानूनी अधिकारों की रक्षा करेगा बल्कि समाज में महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को भी सुनिश्चित करेगा।

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