कवर्धा के शासकीय हाई स्कूल छिरहा में 'एक कॉपी, एक पेन' मॉडल से बच्चों के बस्ते का बोझ 6-7 किलो से घटकर 800-900 ग्राम रह गया है। इस पहल से छात्रों की ए …और पढ़ें
कवर्धा जिले का शासकीय हाई स्कूल छिरहा।
बस्ते का वजन 6-7 किलो से घटकर 800-900 ग्राम हुआ।
10वीं बोर्ड का परिणाम 61.80% से बढ़कर 81.08% पहुंचा।
कक्षा में स्थायी पुस्तकें, घर पर नई किताबें रहती हैं।
भावेश मिश्रा, रायपुर। ‘एक कापी, एक पेन… और पूरी पढ़ाई’ -यह कोई नारा नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ में कवर्धा जिले के शासकीय हाई स्कूल छिरहा की सात वर्षों से चली आ रही सफल व्यवस्था है। यहां कक्षा नौवीं और 10वीं के 176 विद्यार्थी प्रतिदिन सिर्फ एक कापी, एक पेन, पानी की बोतल और टिफिन लेकर स्कूल पहुंचते हैं। सभी विषयों की पुरानी पुस्तकें कक्षा में स्थायी रूप से उपलब्ध रहती हैं, जबकि नई किताबें घर पर।
वर्ष 2019 में शुरू हुई इस पहल से बच्चों के बस्ते का वजन छह-सात किलो से घटकर महज 800 से 900 ग्राम रह गया है। हल्के बस्ते के साथ बच्चों पर मानसिक दबाव भी कम हुआ है और पढ़ाई में उनकी एकाग्रता बढ़ी है।
इसी का परिणाम है कि 10वीं कक्षा का परीक्षा परिणाम 61.80 प्रतिशत से बढ़कर 81.08 प्रतिशत तक पहुंच गया। 2021 में तो स्कूल ने 100 प्रतिशत परिणाम भी हासिल किया। आज यह मॉडल नई शिक्षा नीति की भावना के अनुरूप सरकारी स्कूलों के लिए प्रेरक उदाहरण बन चुका है।
प्राचार्य डॉ. रमेश कुमार चन्द्रवंशी ने बताया कि वे जुलाई 2012 से इस स्कूल में व्याख्याता के रूप में पदस्थ हैं। बच्चों को रोज भारी बस्तों के साथ स्कूल आते-जाते देखकर वे हमेशा चिंतित रहते थे। इसी दौरान उनके मन में विचार आया कि यदि विद्यार्थी परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद अपनी पुरानी पुस्तकें स्कूल को दान कर दें, तो उनसे नई व्यवस्था विकसित की जा सकती है।
वर्ष 2015 में प्राचार्य का दायित्व संभालने के बाद उन्होंने इस दिशा में पहल शुरू की। सबसे पहले विद्यार्थियों को अपनी पुरानी किताबें स्वेच्छा से विद्यालय को दान करने के लिए प्रेरित किया गया। पर्याप्त संख्या में पुस्तकें एकत्र होने के बाद पांच सितंबर 2019, शिक्षक दिवस के अवसर पर इस व्यवस्था की शुरुआत की गई। इसके तहत नौवीं और 10वीं के प्रत्येक टेबल पर सभी विषयों की पाठ्यपुस्तकों का एक-एक सेट स्थायी रूप से उपलब्ध करा दिया गया।
उन्होंने बताया कि वर्तमान में स्कूल में प्राचार्य सहित केवल चार शिक्षक ही कार्यरत हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद विषयवार समय-सारिणी, अलग अध्ययन क्षेत्र और सतत मूल्यांकन के माध्यम से पढ़ाई सुचारु रूप से संचालित हो रही है। विद्यार्थी स्कूल में कक्षा की पुस्तकों से अध्ययन करते हैं, जबकि घर पर नई पुस्तकों और फेयर कापी में अभ्यास करते हैं। स्कूल में केवल एक रफ कापी का उपयोग किया जाता है।
व्याख्याता कल्पना मरावी बताती हैं कि फेयर कापियों की जांच की व्यवस्था भी इस माडल के अनुरूप बनाई गई है। विद्यार्थियों को एक दिन में केवल एक ही कापी जांच के लिए लाने को कहा जाता है, ताकि उनके बस्ते पर अतिरिक्त बोझ न पड़े। विद्यार्थियों का कहना है कि हल्के बस्ते से अब कंधों का दर्द लगभग खत्म हो गया है। पहले की तुलना में वे अधिक सहज महसूस करते हैं और पढ़ाई में उनकी एकाग्रता व रुचि भी बढ़ी है।
इस व्यवस्था का लाभ अब तक सात बैच के विद्यार्थी उठा चुके हैं। विद्यालय का 10वीं बोर्ड परीक्षा परिणाम 81 प्रतिशत रहा है और विद्यार्थियों की नियमित उपस्थिति 90 प्रतिशत से अधिक है। शिक्षकों के अनुसार, किताबों का बोझ कम होने से विद्यार्थियों की पढ़ाई में एकाग्रता बढ़ी है।
इस व्यवस्था को टिकाऊ बनाने में पूर्व विद्यार्थियों का भी योगदान है। उत्तीर्ण छात्र-छात्राएं अपनी पुस्तकें विद्यालय को दान कर देते हैं। इन्हीं से प्रत्येक कक्षा के लिए स्थायी पुस्तक सेट तैयार किए गए हैं। वर्तमान में स्कूल में लगभग 300 पुस्तक सेट हैं और प्रत्येक टेबल पर एक सेट रखा गया है।
नौवीं कक्षा की छात्रा ज्योति साहू और 10वीं कक्षा के छात्र प्रिंस पटेल बताते हैं कि अब स्कूल आने के लिए केवल एक कापी और पेन साथ लाना पड़ता है। भारी बस्ते का बोझ खत्म होने से कंधों का दर्द और शारीरिक थकान दूर हो गई है। इससे स्कूल आना आसान और पढ़ाई में अधिक मन लगने लगा है।
भारी बैग हटने से बच्चों के शरीर पर अतिरिक्त दबाव कम हुआ है और विद्यालय में आनंदमय शिक्षण का वातावरण बना है।- व्याख्याता रंजीता माहेश्वरी, जीव विज्ञान। वहीं डॉ. अतुल जैन, अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ कहते हैं कि 800-900 ग्राम के हल्के बस्ते से बच्चों को शारीरिक तकलीफों से राहत मिलती है और उनका मानसिक व शारीरिक विकास बेहतर होता है।
डॉ. रमेश कुमार चन्द्रवंशी आगे कहते हैं कि वर्ष 2015 से प्राचार्य की जिम्मेदारी निभा रहा हूं। पिछले सात वर्षों से यह व्यवस्था पढ़ाई को आसान, आनंददायक और तनावमुक्त बना रही है। वर्ष 2013 से 2018 तक छः वर्षों के बोर्ड परीक्षा का औसत परीक्षा परिणाम 61.80 प्रतिशत, वर्ष 2019 से 2025 तक छः वर्षों में बोर्ड परीक्षा का औसत परीक्षा परिणाम 81.08 प्रतिशत रहा है। इस प्रकार वर्ष 2019 के बाद वार्षिक परीक्षा परिणाम में प्रतिवर्ष औसतन 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
10वीं का परिणाम (वर्षवार)