अमेरिका रिटर्न, पहला शो फ्लॉप… 37 दिन के आंदोलन से गेम पलटने वाले अभिजीत दिपके की कहानी – Aaj Tak News

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कहते हैं कि जब इतिहास लिखा जाता है, तो उसकी शुरुआत अक्सर किसी बहुत बड़े भाषण से नहीं, बल्कि एक मजबूत इरादों से होती है. 30 साल के अभिजीत दिपके की कहानी भी कुछ ऐसी ही है- एक ऐसा युवा जिसने अमेरिका में रहते हुए सिर्फ अपनी सोच और इरादों के दम पर देश के सबसे बड़े छात्र आंदोलनों में से एक की नींव रख दी.
6 जून 2026 को बोस्टन (अमेरिका) से जब अभिजीत दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरे, तो उनके हाथ में संविधान की प्रति और डॉ. बी.आर. अंबेडकर की ऑटोबायोग्राफी थी. दिल्ली पहुंचते ही सुबह-सुबह उन्होंने एक्स (X) पर लिखा था- ‘लैंडिंग हो गई… जंतर-मंतर पर मिलने का इंतजार है. फूल लाइएगा, पुलिसकर्मियों को दीजिएगा, यह लड़ाई प्रेम और शांति की है!’
लेकिन 6 जून का वो पहला दिन किसी फ्लॉप शो से कम नहीं था. सुबह 10 बजे जंतर-मंतर पहुंचे, 5 बार जोश में भाषण दिया, ‘धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दो’ के नारे लगे, पर दोपहर होते-होते उनकी तबीयत बिगड़ गई और प्रदर्शन खत्म करना पड़ा. भीड़ बहुत कम थी, लोग मान रहे थे कि सोशल मीडिया की यह ‘कॉकरोच जनता पार्टी (CJP)’ हवा-हवाई साबित होगी.
दिपके ने हार नहीं मानी
20 जून को वे फिर जंतर-मंतर पहुंचे और दूसरे दौर का आंदोलन शुरू किया. इस बार उनके साथ खड़े हुए मशहूर शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक, जिन्होंने 28 जून से जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी. वांगचुक के अनशन ने इस आंदोलन को एक नैतिक और मजबूत आधार दिया.
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तबियत बिगड़ने के बाद सोनम वांगचुक को 19 जुलाई को अस्पताल में भर्ती कराया गया. सोनम वांगचुक ने लगातार 27 दिनों तक अस्पताल से अनशन जारी रखा और 23 जुलाई को जब उन्होंने अनशन खत्म किया, तब तक सरकार बैकफुट पर आ चुकी थी.
आंदोलन का टर्निंग प्वॉइंट
असली मोड़ तब आया जब 20 जुलाई को ‘चलो संसद’ मार्च के दौरान पुलिस का लाठीचार्ज हुआ. इसने पूरे देश के युवाओं में आक्रोश की आग भड़का दी. देखते ही देखते जंतर-मंतर पर देश भर से हजारों छात्रों का जनसैलाब उमड़ पड़ा.  घनी दाढ़ी, टी-शर्ट और जींस में नजर आने वाले दिपके अब CJP का सबसे चर्चित चेहरा बन चुके थे. वे सैकड़ों लोगों की भीड़ को संबोधित करते हुए लगातार शांतिपूर्ण आंदोलन की अपील करते और साथ ही सरकार पर दबाव बनाए रखने की बात भी कहते रहे और खुद दो दिन अनशन पर बैठ गए.
हालांकि CJP के कई आयोजक हैं, लेकिन दिपके ने अपने प्रभाव और सक्रियता के दम पर खुद को संगठन का सबसे पहचान प्रमुख चेहरा बना लिया.  ‘चलो संसद’ मार्च के दौरान दिल्ली पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई. लाठीचार्ज के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए. यहीं से आंदोलन दिल्ली से निकलकर देशव्यापी बन गया. 
महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, तमिलनाडु समेत कई राज्यों से छात्र दिल्ली पहुंचने लगे. हजारों लोग जंतर-मंतर पर जुटने लगे. ऑनलाइन शुरू हुआ आंदोलन अब पूरी तरह ऑफलाइन हो चुका था. बढ़ते दबाव के बीच केंद्र सरकार को बातचीत की मेज पर आना पड़ा. केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह तथा CJP के प्रतिनिधियों-सौरभ दास और आशुतोष रांका के बीच कई दौर की बातचीत हुई.
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और धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा
 सरकार ने आंदोलन की कुछ अहम मांगों पर सकारात्मक रुख दिखाया. नीट से जुड़े आत्महत्या मामलों में सहायता और प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने जैसे मुद्दों पर सहमति बनने लगी. लेकिन सबसे बड़ी मांग एक ही थी- धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें. सरकार ने बातचीत शुरू की.और फिर आया वो ऐतिहासिक दिन… 25 जुलाई 2026.
जिस मुख्य मांग के लिए अभिजीत और देश के लाखों छात्र अड़े थे, वह पूरी हुई और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया.
एक ट्वीट से शुरू हुई कहानी
दिलचस्प बात यह है कि इस आंदोलन की शुरुआत किसी राजनीतिक दल के दफ्तर से नहीं हुई थी. यह शुरुआत हुई थी सोशल मीडिया पर अभिजीत दिपके के छह शब्दों से- “What if all cockroaches come together?” (क्या होगा अगर सारे कॉकरोच एक साथ आ जाएं?). सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी के जवाब में किया गया यह व्यंग्यात्मक पोस्ट कुछ ही दिनों में करोड़ों युवाओं तक पहुंच गया. वहीं से कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का विचार जन्मा. इसके इंस्टाग्राम अकाउंट ने कुछ ही दिनों में 22 मिलियन फॉलोअर्स जुटा लिए और हाल ही में यह संख्या बढ़कर 25 मिलियन को पार कर गई.
महाराष्ट्र के औरंगाबाद के एक साधारण दलित परिवार में जन्मे अभिजीत दिपके के पिता बेहद सामान्य पृष्ठभूमि से आते हैं. छात्र जीवन से ही सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों में उनकी रुचि रही. उन्होंने आम आदमी पार्टी की सोशल मीडिया टीम में भी काम किया, जहां उन्होंने मीम, व्यंग्य और डिजिटल कम्युनिकेशन की नई शैली विकसित की. बाद में उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका के बोस्टन चले गए और वहीं से भारतीय राजनीति पर लगातार सक्रिय रहे.
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Gen-Z राजनीति का नया चेहरा
अभिजीत दिपके की सबसे बड़ी सफलता सिर्फ एक मंत्री का इस्तीफा नहीं है. उन्होंने यह दिखाया कि आज की Gen-Z केवल सोशल मीडिया पर ट्रेंड नहीं चलाती, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर सड़क पर उतरकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात भी मनवा सकती है. अमेरिका से लौटे एक युवा का पहला प्रदर्शन भले फीका रहा हो, लेकिन 37 दिन बाद वही आंदोलन देश की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया. शायद यही इस कहानी का सबसे बड़ा मोड़ है.
6 जून के उस ‘फ्लॉप शो’ से शुरू हुई कहानी ने 25 जुलाई को एक ऐसी ऐतिहासिक जीत लिखी, जिसकी कल्पना शायद खुद सरकार ने भी नहीं की थी. यह भारत के Gen-Z की वो सबसे बड़ी जीत है जो ऐतिहासिक है.
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