हल्का-फुल्का 'स्वदेशी' ड्रोन डिफेंस सिस्टम, जो करेगा भारत के दुश्मनों की हवा टाइट, देसी C-UAS के आगे आओगे तो मरोगे! – News18 Hindi

इस वक्त पूरी दुनिया में जिस तरह से तनाव चल रहा है, उसमें हर देश अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए काम करने में जुटा हुआ है. खासतौर पर भारत के आसपास के देशों पर जिस तरह से चीन अपनी नज़रें गड़ाए बैठा है, भारत को ऐसे हथियारों की ज़रूरत है, जो सस्ते-मजबूत और किलर हों. इसी कड़ी में अब भारतीय सेना हवाई सुरक्षा को मजबूत करने के लिए एक अहम कदम उठा रही है.
भारतीय सेना ने अपनी हवाई सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए देशी कंपनियों से नई तकनीक वाले ड्रोन रोधी सिस्टम (Counter-Unmanned Aerial Systems – C-UAS) के लिए प्रस्ताव मांगे हैं. सेना की ओर से रिक्वेस्ट ऑफ इंफॉर्मेशन रिलीज़ किया गया है, जिसमें C-UAS और DAP-2020 की प्राप्ति की बात की गई है. इसमें दो प्रकार के सिस्टम शामिल हैं – ग्राउंड-बेस्ड सिस्टम और मैनपैक सिस्टम, जिसे एक सैनिक आसानी से ले जा सके.
ऑपरेशन ‘सिंदूर’ के दौरान जब भारत-पाकिस्तान में सैन्य झड़प हुई, तो पाकिस्तान ने भारत की सैन्य और नागरिक ठिकानों पर सैकड़ों ड्रोन भेजे. भारतीय सेना की सतर्कता के चलते ज़्यादातर ड्रोन मार गिराए गए, लेकिन मॉडर्न वॉरफेयर के इस नज़ारे ने भारत को आगे के लिए सतर्क कर दिया. पाकिस्तान और चीन से ड्रोन हमलों के खतरे को देखते हुए अब सेना ऐसे ड्रोन को रोकने के लिए नई तकनीक चाहती है जो GPS, चीन के BeiDou जैसे सैटेलाइट सिस्टम्स से निर्देशित हथियारों को खत्म कर सके.
ग्राउंड-बेस्ड C-UAS, जो दुश्मन ड्रोन्स का पता लगाने, उनकी पहचान करने और उन्हें निष्क्रिय करने में सक्षम है. इससे युद्धक्षेत्र में जीवित रहने की क्षमता और सुरक्षा बढ़ती है. आधुनिक युद्ध में ड्रोन्स का उपयोग निगरानी, टोह लेने और हमलों के लिए तेजी से बढ़ रहा है, इसलिए यह सिस्टम विभिन्न खतरे के परिदृश्यों से निपटने के लिए कई सेंसर और जुड़ाव तंत्रों को यूनीफाई करेगा. RFI में विभिन्न इलाकों में तैनाती पर जोर दिया गया है, जिसमें 14,500 फीट तक की ऊंचाई वाले क्षेत्र, मैदान, रेगिस्तान और दलदली क्षेत्र शामिल हैं, ताकि भारत के अलग-अलग हिस्सों में इसे तैनात किया जा सके.
RFI में दिसंबर 2025 में रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) जारी करने की अस्थायी समय-सीमा निर्धारित की गई है, जिसमें विक्रेताओं से कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के 12 महीनों के अंदर शुरुआती मात्रा में आपूर्ति करने की अपेक्षा की जा रही है. स्वदेशी डिज़ाइन, विकास और निर्माण (IDDM) को प्राथमिकता देते हुए खरीद में कम से कम 50% स्वदेशी सामग्री की जरूरत है, जो भारत की आत्मनिर्भर भारत पहल का को बढ़ावा देता है.
सेना ने कहा है कि सिस्टम हर मौसम में काम करे और उसे आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सके. सैनिक से संचालित होने वाले सिस्टम का वज़न 9 किलोग्राम के अंदर ही हो, ताकि जरूरत पड़ने पर जल्दी तैनात हो सके. भारतीय सेना अब आधुनिक ड्रोन युद्ध के लिए खुद को तैयार कर रही है और देश की कंपनियों से मजबूत, हल्के और स्मार्ट ड्रोन रोधी सिस्टम चाहती है.

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