बिलासपुर। 30 अक्टूबर 2026| केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल CRPF के एक निरीक्षक को जेल में रहते हुए विभागीय जांच में अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना बर्खास्त करने की कार्रवाई को छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के जस्टिस एके प्रसाद के सिंगल बेंच ने गलत ठहराया है। कोर्ट ने बर्खास्तगी और उसके खिलाफ अपील खारिज करने के आदेश निरस्त कर दिया है।
कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निरीक्षक वाईके सोलोमन को सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया है। हालांकि, उन्हें पिछला वेतन नहीं मिलेगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विभाग चाहे तो कानून के अनुसार नए सिरे से विभागीय कार्यवाही कर सकता है।
पढ़िए क्या है मामला?
मणिपुर निवासी वाईके सोलोमन CRPF में निरीक्षक के पद पर कार्यरत थे। वर्ष 2015 में अंबिकापुर में प्रशिक्षण के दौरान 2 अगस्त को उनका संजय सिंह नामक व्यक्ति से विवाद और मारपीट हुई थी। संजय सिंह की उपचार के दौरान 11 अक्टूबर 2015 को मौत हो गई। इस मामले में सोलोमन के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया था।
विभाग ने घटना की जानकारी छिपाने और बल की छवि को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू की।विभागीय जांच रिपेार्ट के बाद 3 सितंबर 2018 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया। मामले की सुनवाई के बाद अंबिकापुर के तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश ने 1 नवंबर 2021 को आपराधिक मामले में संदेह का लाभ देते हुए उन्हें बरी कर दिया। इसके बाद उन्होंने बहाली के लिए अपील की, जिसे 11 मई 2022 को खारिज कर दिया गया। विभागीय आदेश को चुनौती देते हुए निरीक्षक ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।
जमानत पर रिहाई के बाद जांच प्रारंभ करने किया था अनुरोध, विभाग ने ठुकरा दिया
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि वह न्यायिक हिरासत में थे और उन्होंने विभाग को लिखकर बताया था कि जेल में रहते हुए अपना बचाव करना संभव नहीं है। जमानत पर रिहा होने के बाद विभागीय जांच प्रारंभ करने का अनुरोध किया था, लेकिन विभाग ने इस पर ध्यान नहीं दिया और उनकी अनुपस्थिति में ही जांच पूरी कर बर्खास्तगी का आदेश जारी कर दिया।
केंद्र सरकार ने बर्खास्तगी आदेश को ठहराया सही
केंद्र सरकार की ओर से दलील दी गई कि सोलोमन ने घटना की जानकारी विभाग को नहीं दी थी और उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई उचित थी। यह भी कहा गया कि उन्हें वैकल्पिक अपील का रास्ता अपनाना चाहिए था।
प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन
याचिका की सुनवाई जस्टिस एके प्रसाद के सिंगल बेंच में हुई। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, आपराधिक मामले में संदेह का लाभ मिलने से अपने आप विभागीय कार्रवाई समाप्त नहीं हो जाती। आपराधिक मुकदमे और विभागीय जांच में प्रमाण के मानक अलग होते हैं।
कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता निरीक्षक सोलोमन ने जेल से ही विभाग को जवाब देकर सुनवाई टालने का अनुरोध किया था, फिर भी उनकी बात पर विचार किए बिना जांच पूरी कर ली गई। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और निष्पक्ष सुनवाई की अनिवार्यता के विरुद्ध है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि गंभीर दंड देने से पहले कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का वास्तविक अवसर मिलना चाहिए।
पिछला वेतन के बिना बहाली का दिया निर्देश
हाई कोर्ट ने 3 सितंबर 2018 का बर्खास्तगी आदेश और 11 मई 2022 का अपील आदेश को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता निरीक्षक को बिना पिछले वेतन के सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया है। विभाग को कानून के अनुसार नई विभागीय जांच शुरू करने की स्वतंत्रता भी कोर्ट ने दी है।
राधाकिशन शर्मा: शिक्षा: बीएससी, एमए राजनीति शास्त्र व हिन्दी साहित्य में मास्टर डिग्री, वर्ष 1998 से देशबंधु से पत्रकारिता की शुरुआत। हरिभूमि व दैनिक भास्कर में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया। 2007 से जुलाई 2024 तक नईदुनिया में डिप्टी न्यूज एडिटर व सिटी चीफ के पद पर कार्य का लंबा अनुभव। 1 अगस्त 2024 से एनपीजी न्यूज में कार्यरत।