Jagannath Rath Yatra 2026: भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि रिश्तों, लोकपरंपराओं और भावनाओं का भी महापर्व है. इस यात्रा से जुड़ी सबसे रोचक मान्यताओं में से एक है भगवान जगन्नाथ का हर साल अपनी मौसी के घर जाना. रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा श्रीमंदिर से निकलकर गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं, जहां वे लगभग सात दिन तक विराजमान रहते हैं. वहीं, बहुदा यात्रा के दौरान भगवान मौसी मां मंदिर में भी रुकते हैं, जहां उन्हें उनका प्रिय भोग अर्पित किया जाता है. यही वजह है कि रथयात्रा को भगवान के पारिवारिक स्नेह और लोकजीवन से जुड़ा सबसे भावनात्मक पर्व भी माना जाता है.
भगवान जगन्नाथ की मौसी को लेकर पुरी में दो प्रमुख लोकपरंपराएं प्रचलित हैं. पहली मान्यता के अनुसार गुंडिचा देवी को भगवान की मौसी माना जाता है. इसी कारण गुंडिचा मंदिर को श्रद्धालु प्रेम से ‘मौसी का घर’ भी कहते हैं, जहां भगवान रथयात्रा के दौरान सात दिन तक विराजमान रहते हैं.
वहीं दूसरी परंपरा के अनुसार ग्रैंड रोड पर स्थित मौसी मां अर्धशोशिनी मंदिर का भी भगवान जगन्नाथ से विशेष संबंध है. बहुदा यात्रा के दौरान भगवान का रथ यहां रुकता है और उन्हें विशेष भोग अर्पित किया जाता है. श्रीजगन्नाथ संस्कृति में दोनों मान्यताओं का सम्मान किया जाता है और दोनों ही रथयात्रा का अभिन्न हिस्सा हैं.
Jagannath Rath Yatra 2026
पुरी में प्रचलित लोकमान्यताओं के अनुसार, जब भगवान जगन्नाथ पहली बार अपनी मौसी के यहां पहुंचे तो उनका बड़े प्रेम और स्नेह से स्वागत किया गया. मौसी ने भगवान से आग्रह किया कि वे हर वर्ष उनसे मिलने अवश्य आया करें. कहा जाता है कि भगवान ने भी उनके स्नेह का मान रखते हुए प्रतिवर्ष आने का आश्वासन दिया. तभी से रथयात्रा के दौरान भगवान के मौसी के घर जाने की परंपरा चली आ रही है. इसे शास्त्रीय तथ्य के बजाय पुरी की प्राचीन लोकमान्यता के रूप में ही देखा जाता है.
रथयात्रा के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने-अपने रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं. यहां तीनों विग्रह लगभग सात दिन तक विराजमान रहते हैं. इस दौरान लाखों श्रद्धालु गुंडिचा मंदिर पहुंचकर दर्शन करते हैं. सात दिन पूरे होने के बाद भगवान बहुदा यात्रा के साथ श्रीमंदिर लौटते हैं.
रथयात्रा का पहला दिन भगवान के श्रीमंदिर से प्रस्थान और गुंडिचा मंदिर पहुंचने का होता है. दूसरे दिन विशेष अनुष्ठान के बाद तीनों विग्रहों को रथ से उतारकर आडप मंडप में विराजमान कराया जाता है. इसके बाद कई दिनों तक विशेष पूजा, श्रृंगार, भोग और दर्शन की परंपरा चलती है. देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालु इन दिनों भगवान के दर्शन कर स्वयं को धन्य मानते हैं.इसी प्रवास के दौरान हेरा पंचमी का पर्व भी मनाया जाता है. लोकमान्यता है कि माता लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ को वापस श्रीमंदिर बुलाने के लिए गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं. यह रथयात्रा का सबसे भावुक और लोकप्रिय प्रसंग माना जाता है. सात दिन पूरे होने पर बहुदा यात्रा शुरू होती है. भगवान अपने रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर लौटते हैं. वापसी के दौरान उनका रथ मौसी मां (अर्धशोशिनी) मंदिर पर रुकता है, जहां उनका विशेष स्वागत किया जाता है.
बहुदा यात्रा के दौरान मौसी मां मंदिर में भगवान जगन्नाथ को पोडा पीठा का भोग लगाया जाता है. यह ओडिशा का प्रसिद्ध पारंपरिक पकवान है, जिसे चावल, गुड़, दाल, नारियल और घी से तैयार कर धीमी आंच पर पकाया जाता है. लोकमान्यता है कि स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं. ऐसे में मौसी मां उन्हें स्नेहपूर्वक पोड़ा पीठा खिलाती हैं. यह भोग केवल भोजन नहीं, बल्कि मौसी के वात्सल्य, सेवा और अपनत्व का प्रतीक माना जाता है.
भगवान के आगमन पर मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, वैदिक मंत्रोच्चार और आरती की जाती है. भगवान को पारंपरिक विधि से भोग अर्पित किया जाता है और श्रद्धालु पूरे उत्साह के साथ उनका स्वागत करते हैं. रथयात्रा के दौरान भगवान के स्वागत का यह दृश्य किसी परिवार में प्रिय अतिथि के आगमन जैसा प्रतीत होता है.
जगन्नाथ संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यहां भगवान को केवल आराध्य नहीं, बल्कि परिवार का सदस्य भी माना जाता है. वे स्नान करते हैं, अस्वस्थ होते हैं, विश्राम करते हैं, यात्रा पर निकलते हैं, भक्तों से मिलते हैं और अपने रिश्तेदारों के यहां भी जाते हैं. यही मानवीय भाव भगवान जगन्नाथ की परंपरा को भारत की सबसे अनूठी धार्मिक परंपराओं में शामिल करता है. मौसी के घर जाने की यह परंपरा भारतीय संस्कृति में रिश्तों, अपनत्व और पारिवारिक मूल्यों का संदेश देती है. यही कारण है कि हर साल रथयात्रा के दौरान लाखों श्रद्धालु इस अद्भुत परंपरा के साक्षी बनने के लिए पुरी पहुंचते हैं.
नोट: भगवान जगन्नाथ की मौसी, गुंडिचा देवी और मौसी मां अर्धशोशिनी मंदिर से जुड़ी कथाएं मुख्य रूप से पुरी की लोकपरंपराओं और प्रचलित मान्यताओं पर आधारित हैं. अलग-अलग परंपराओं और विद्वानों के बीच इनके स्वरूप और कथाओं के विवरण में कुछ अंतर मिल सकता है.
डिस्क्लेमर: यहां दी गई सभी जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं. India.Com इसकी पुष्टि नहीं करता. इसके लिए किसी एक्सपर्ट की सलाह अवश्य लें.
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नेहा अवस्थी को पत्रकारिता के क्षेत्र में 18 सालों का अनुभव है. नेहा टीवी और डिजिटल दोनों माध्यमों की जानकार हैं. इन 18 सालों में इन्होंने कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों … और पढ़ें
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