वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले से भारत को हुआ नुकसान, दुर्लभ धातुओं में होना था निवेश – Jagran

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अमेरिका के हमलों और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की सत्ता से बेदखली के कारण वेनेजुएला में महत्वपूर्ण खनिजों के खनन में निवेश करने की भारत की मंशा पर ब्रेक …और पढ़ें
डोनल्ड ट्रंप और निकोलस मादुरो। (फाइल फोटो)
जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। वेनेजुएला पर अमेरिका का हमला और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की सत्ता से बेदखली ने इस दक्षिणी अमेरिकी देश में क्रिटिकल मिनिरल्स क्षेत्र में निवेश करने की भारत की मंशा पर शुरुआत में ही ब्रेक लगा दिया है।
दरअसल 26 नवंबर, 2025 को ही दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों के बीच हुई बैठक में दुर्लभ धातुओं के क्षेत्र में भारतीय निवेश एक अहम मुद्दा था। उस बैठक की सह-अध्यक्षता भारतीय विदेश मंत्रालय के सचिव (पूर्व) पी. कुमारन और वेनेजुएला की विदेश उपमंत्री तातियाना जोसेफिना पुग मोरेनो ने की थी। वेनेजुएला खासतौर पर इस बात के लिए उत्साहित था कि भारतीय कंपनियां जैसे अर्जेंटीना में दुर्लभ धातुओं की खोज में निवेश कर रही हैं वैसा ही उनकी कंपनियों के साथ मिलकर करें।
अब जबकि अमेरिका की तरफ से वेनेजुएला पर हमला किया गया है तो इसके पीछे इन्हीं दुर्लभ धातुओं को एक बड़ा कारण बताया जा रहा है। भारत का वेनेजुएला के साथ संबंध हमेशा से ही काफी सौहार्दपूर्ण रहा है, लेकिन जब से अमेरिका ने वेनेजुएला पर प्रतिबंध लगाना शुरू किया है तो इससे भारत के साथ संबंध भी प्रभावित हुए हैं।
अमेरिका ने वर्ष 2019 में पहली बार वेनेजुएला पर प्रतिबंध लगाए लेकिन उस समय यह भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति करने वाला प्रमुख देश था। वर्ष 2010 से वर्ष 2019 तक भारत के कुल तेल आयात का 10 प्रतिशत वेनेजुएला से आता था।
वेनेजुएला में हेवी क्रूड की अधिकता है जो भारत की पुरानी रिफाइनरियों के लिए एकदम उपयुक्त हैं। वर्ष 2020 के बाद भारत ने वेनेजुएला से तेल खरादना बंद कर दिया।
वर्ष 2023 में अमेरिका ने वेनेजुएला को कुछ अस्थाई ढील दी थी तब भारतीय रिफाइनरियों (खासतौर पर रिलायंस पेट्रोलियम) ने इससे फिर से तेल खरीदना शुरू कर दिया था। लेकिन मार्च, 2025 में राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने इसे पर नए सिरे से प्रतिबंध लगाना शुरू कर दिया। उसके बाद भारत ने कोई तेल की खरीद नहीं की है।
दोनों देशों के बीच कारोबारी संबंध ऊर्जा पर ही केंद्रित रहे हैं। भारत के दौरे पर आने वाले वेनेजुएला के एकमात्र राष्ट्रपति ह्युजो शावेज (वर्ष 2005) ने दोनों देशों के बीच ‘आयल डिप्लोमेसी’ की नींव रखी थी। तब भारत कच्चे तेल के लिए खाड़ी देशों पर पूरी तरह निर्भर था।
वेनेजुएला से आपूर्ति शुरू होने के बाद भारत की निर्भरता इराक, सउदी अरब, यूएई, ईरान जैसे देशों पर कम हुई। वेनेजुएला की कार्यकारी उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज ने फरवरी 2025 में भारत एनर्जी वीक में भाग लिया था और यहां की सरकारी व निजी तेल कंपनियों के साथ मुलाकात की थी।
एक सरकारी तेल कंपनी के एक अधिकारी के मुताबिक, ‘ वेनेजुएला की सरकार बहुत ही आकर्षक कीमत पर तेल भारत को देने को तत्पर रही है लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से हमारे लिए सौदा करना आसान नहीं था।’ सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2024-25 में द्विपक्षीय व्यापार लगभग 1.8 बिलियन डालर (सिर्फ कच्चे तेल का आयात 1.6 अरब डालर) का था।
वेनेजुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार के अलावा ओरिनोको माइनिंग आर्क क्षेत्र में कोल्टान (टैंटलम/नियोबियम), रेयर अर्थ एलिमेंट्स (आरईई), लिथियम, निकल, कोबाल्ट, गोल्ड और बाक्साइट जैसे क्रिटिकल मिनरल्स के बड़े भंडार हैं। ये इलेक्ट्रानिक्स, इलेक्टि्रक व्हीकल्स, बैटरी, हथियार और रिन्यूएबल एनर्जी के लिए आवश्यक हैं।
चीन से संबंध होने के बावजूद वेनेजुएला ने इनके भंडार पर उसका प्रभुत्व नहीं होने दिया है। ऐसे में भारत को वहां संभावनाएं दिख रही थीं। माना जाता है कि ट्रंप प्रशासन की नजर भी इन भंडारों पर है।
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