1993 से 2026 तक… हर बड़े एजुकेशन रिफॉर्म में ISRO का रोल क्यों होता है? – AajTak

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ISRO (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) भारत की अंतरिक्ष एजेंसी दशकों से देश के अंतरिक्ष मिशनों का नेतृत्व कर रही है. इसी इसरो ने बड़े शिक्षा सुधारों को आकार देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इस यात्रा के केंद्र में यश पाल, के. कस्तूरीरंगन और पूर्व इसरो अध्यक्ष एस. सोमनाथ जैसे नाम रहे हैं. आइए जानते हैं कि जब भी बड़े सुधारों की जरूरत होती है, तो सरकारें बार-बार इसरो की ओर ही क्यों रुख करती हैं?
परीक्षा विवाद के बाद नया प्रयास
रविवार शाम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘हेलो फ्रेंड्स’ से शुरू होने वाले एक छोटे से पोर्ट्रेट-फॉर्मेट वीडियो संदेश के जरिए परीक्षा सुधार टास्क फोर्स की घोषणा की. यह घोषणा राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) में बदलावों और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के कुछ ही दिनों बाद आई है. इस नई टास्क फोर्स के केंद्र में भारत की परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित बनाने के लिए तकनीक का उपयोग करना है.
पूर्व इसरो अध्यक्ष एस. सोमनाथ इस टास्क फोर्स के टेक्नोलॉजी (तकनीकी) घटक का नेतृत्व करेंगे. उनके साथ इंफोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणि (जो इस टास्क फोर्स की अध्यक्षता कर रहे हैं) और IIT मद्रास के निदेशक वी. कामाकोटी शामिल हैं.
ये घोषणा भारत के शिक्षा सुधारों में एक परिचित पैटर्न को फिर से दोहराती है. 1993 की यश पाल समिति से लेकर के. कस्तूरीरंगन के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 तक, भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़े वैज्ञानिकों को बार-बार देश के सबसे बड़े शिक्षा सुधारों की जिम्मेदारी सौंपी गई है.
परीक्षा संकट के बाद मिला नया जोर
यह टास्क फोर्स परीक्षा सुरक्षा को लेकर लगातार सामने आ रही चिंताओं के बाद बनाई गई है. पिछले आठ वर्षों में देश भर में 100 से अधिक कथित पेपर लीक की घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिससे सार्वजनिक परीक्षाओं की साख पर गंभीर सवाल उठे हैं. NEET परीक्षा को लेकर बने विवाद जिसने तीन सालों में दो बड़े संकट देखे, इसी ने विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया और परीक्षा प्रणाली की नए सिरे से जांच-परख शुरू कराई.
सरकार ने इस नई समिति को इन चिंताओं के जवाब में एक ‘तकनीकी समाधान’ के रूप में पेश किया है. नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता वाली इस समिति में पूर्व इसरो प्रमुख एस. सोमनाथ, IIT मद्रास के निदेशक वी. कामाकोटी और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल हैं. समिति का मुख्य उद्देश्य परीक्षाओं को अधिक सुरक्षित बनाने और पेपर लीक की संभावना को खत्म करने के लिए तकनीक के इस्तेमाल पर ध्यान केंद्रित करना है. हालांकि, इस टास्क फोर्स का विस्तृत रोडमैप अभी सार्वजनिक किया जाना बाकी है.
शिक्षा सुधारों से पुराना और लंबा नाता
शिक्षा सुधारों में किसी पूर्व इसरो प्रमुख को शामिल करना कोई अलग-थलग फैसला नहीं है. पिछले तीन दशकों में, शिक्षा प्रणाली को फिर से नया रूप देते समय सरकार ने बार-बार भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़े वैज्ञानिकों पर भरोसा जताया है.
प्रोफेसर यश पाल (1993): पहला बड़ा उदाहरण 1993 में सामने आया, जब मानव संसाधन विकास मंत्रालय (MHRD) ने प्रो. यश पाल की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया. भारत के प्रमुख शिक्षाविद् बनने से पहले, यश पाल ने इसरो के ‘स्पेस एप्लीकेशन सेंटर’ से जुड़कर भारत के अंतरिक्ष अनुप्रयोग कार्यक्रम को विकसित करने में अहम भूमिका निभाई थी.
‘लर्निंग विदाउट बर्डन’ (बिना बोझ के सीखना): उनकी समिति ने ऐतिहासिक रिपोर्ट पेश की, जिसमें कहा गया कि स्कूली शिक्षा को रटने की प्रणाली से दूर ले जाया जाना चाहिए. इसने पाठ्यपुस्तकों का बोझ कम करने, कक्षाओं को बाल-केंद्रित बनाने, परीक्षाओं में सुधार करने और रटने के बजाय अवधारणाओं की समझ को बढ़ावा देने की सिफारिश की. यह रिपोर्ट बाद में कई स्कूली शिक्षा सुधारों का आधार बनी.
NCF 2005: यश पाल के विचारों ने राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF) 2005 को तैयार किया, जिसने गतिविधि-आधारित शिक्षा, आलोचनात्मक सोच और सतत मूल्यांकन को बढ़ावा दिया.
के. कस्तूरीरंगन और NEP 2020: दो दशक से भी अधिक समय बाद, एक और पूर्व इसरो अध्यक्ष को भारत के सबसे बड़े शिक्षा सुधार का नेतृत्व करने के लिए कहा गया.
2017 में, सरकार ने के. कस्तूरीरंगन (जिन्होंने 1994 से 2003 तक इसरो का नेतृत्व किया था) को उस समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया जिसने राष्ट्रीय शिक्षा नीति का ड्राफ्ट तैयार किया. समिति ने 2020 में NEP जारी करने से पहले शिक्षकों, विश्वविद्यालयों, उद्योग निकायों और वैज्ञानिकों के साथ लगभग तीन साल तक विचार-विमर्श किया.
NEP ने नया स्कूल ढांचा (5+3+3+4), बहुविषयक उच्च शिक्षा (Multidisciplinary Higher Education) और कौशल विकास पर जोर दिया. कस्तूरीरंगन को इसलिए चुना गया क्योंकि उन्हें शैक्षणिक रूप से विश्वसनीय, राजनीतिक रूप से तटस्थ और एक जटिल राष्ट्रीय कार्य को संभालने में सक्षम माना जाता था.
आखिर इसरो (ISRO) के वैज्ञानिक ही क्यों?
शिक्षा सुधारों के लिए इसरो वैज्ञानिकों का बार-बार चयन एक महज संयोग नहीं, बल्कि एक सोचा-समझा पैटर्न है. दरअसल यश पाल और कस्तूरीरंगन दोनों ही ऐसे वैज्ञानिक थे जो बाद में सार्वजनिक नीति और संस्थान निर्माण से जुड़े. उनका अनुभव केवल अंतरिक्ष अनुसंधान तक सीमित नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय आयोगों और दीर्घकालिक योजनाओं को संभालने में भी था.
उनके काम में सरकारों, विभिन्न संस्थानों और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच तालमेल बिठाना शामिल था, यही कौशल बाद में शिक्षा नीति में लागू किया गया. वहीं परीक्षा सुधार टास्क फोर्स में एस. सोमनाथ की नियुक्ति इसी सिलसिले को आगे बढ़ाती है. पाठ्यक्रम पर ध्यान देने वाली पिछली समितियों के विपरीत, आज की सबसे बड़ी चुनौती डिजिटल वातावरण में परीक्षाओं को सुरक्षित बनाना है. सरकार का ध्यान तकनीकी सुरक्षा उपायों पर है, जिससे एक पूर्व इसरो अध्यक्ष का शामिल होना इस पैनल के काम के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है.
टास्क फोर्स सफल होगी या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह क्या सिफारिशें करती है और उन्हें कैसे लागू किया जाता है. लेकिन यह फैसला पिछले तीन दशकों के उसी पैटर्न का पालन करता है. जब भी भारत ने बड़े शिक्षा सुधारों का प्रयास किया है, उसने अक्सर उन्हीं नेताओं की ओर रुख किया है जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम से की थी.
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