Shreeom Singh
Date: 03-10-26 09:29
Kumkum Mohod: खेल की दुनिया में कुछ जीत ऐसी होती हैं, जो सिर्फ मेडल तक सीमित नहीं रहतीं. उनके पीछे संघर्ष, मेहनत और मुश्किल हालात से लड़ने की कहानी होती है. महाराष्ट्र के अमरावती की कुमकुम मोहोद की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. कभी दादी से मिले 3 हजार रुपये से लकड़ी का साधारण धनुष खरीदकर तीरंदाजी शुरू करने वाली कुमकुम ने एशियन गेम्स 2026 में इतिहास रच दिया है. उन्होंने भारत के लिए 17वां स्वर्ण पदक जीता और महिला इंडिविजुअल रिकर्व में 48 साल से चले आ रहे पदक के इंतजार को खत्म कर दिया.
2018 में शुरू हुआ तीरंदाजी का सफर
कुमकुम मोहोद का तीरंदाजी से जुड़ने का सफर साल 2018 में शुरू हुआ. उनकी मां रूपाली ने एक रिश्तेदार की बेटी को अमरावती की राधे आर्चरी अकादमी में ट्रेनिंग करते देखा था. इसके बाद उन्होंने कुमकुम को भी तीरंदाजी सीखने के लिए प्रोत्साहित किया.
हालांकि, एक सामान्य परिवार के लिए तीरंदाजी जैसे महंगे खेल का खर्च उठाना आसान नहीं था. कुमकुम के पिता अनिल मोहोद अमरावती में मिठाई की दुकानों के लिए कार्डबोर्ड के डिब्बे बनाने का काम करते हैं. इसी छोटे कारोबार से परिवार का खर्च चलता था और बेटी की ट्रेनिंग का खर्च भी इसी से पूरा किया जाता था.
पिता ने बेटी के लिए नहीं मानी हार
शुरुआत में कुमकुम के लिए आने-जाने और ट्रेनिंग का खर्च जुटाना मुश्किल था. इसके बावजूद उनके पिता ने उनका साथ नहीं छोड़ा. वह अपनी मोटरसाइकिल से रोज बेटी को अकादमी लेकर जाते थे.
कुमकुम ने शुरुआत बांस के एक साधारण धनुष से की थी. दादी से मिले 3 हजार रुपये से खरीदे गए उस धनुष से उन्होंने अपनी ट्रेनिंग शुरू की. सिर्फ छह महीने की मेहनत के बाद उन्होंने सब-जूनियर नेशनल प्रतियोगिता में रजत पदक जीत लिया.
दिलचस्प बात यह है कि आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी कुमकुम अब भी करीब पांच साल पुराने सेकंड-हैंड धनुष से ही निशाना लगाती हैं.
2026 में बदली करियर की दिशा
साल 2026 कुमकुम के करियर के लिए बेहद अहम साबित हुआ. शंघाई में हुए आर्चरी वर्ल्ड कप स्टेज-2 में उन्होंने भारतीय महिला टीम को स्वर्ण पदक दिलाने में अहम भूमिका निभाई. इसके बाद अंताल्या में वर्ल्ड कप स्टेज-3 में उन्होंने धीरज बोम्मदेवरा के साथ मिक्स्ड टीम स्पर्धा में भी गोल्ड जीता.
उनके खेल को और बेहतर बनाने में आर्चरी प्रीमियर लीग के पहले सीजन का भी अहम योगदान रहा. इस लीग में उन्हें दुनिया के कई बड़े तीरंदाजों के साथ खेलने का मौका मिला. यहां हर शॉट के लिए सिर्फ 15 सेकंड का समय मिलता था. इस तेज माहौल ने उन्हें कम समय में फैसला लेने और दबाव में सटीक निशाना लगाने में मदद की.
फाइनल में कोरियाई खिलाड़ी को हराया
नागोया में हो रहे 2026 एशियन गेम्स में कुमकुम इसी आत्मविश्वास के साथ उतरीं. महिला इंडिविजुअल रिकर्व के फाइनल में उनका मुकाबला दक्षिण कोरिया की येजिन ओह से हुआ. दोनों के बीच मुकाबला काफी करीबी रहा और फैसला शूट-ऑफ तक पहुंच गया.
दबाव के इस मुकाबले में कुमकुम ने शानदार संयम दिखाया. उन्होंने शूट-ऑफ में बेहतर प्रदर्शन करते हुए 6-5 से मुकाबला जीत लिया और भारत के लिए स्वर्ण पदक हासिल किया.
48 साल का इंतजार हुआ खत्म
कुमकुम की यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि एशियन गेम्स में 1978 से महिला इंडिविजुअल रिकर्व स्पर्धा होने के बावजूद भारत की कोई महिला तीरंदाज इस इवेंट में पदक नहीं जीत पाई थी.
कुमकुम ने 2026 में इस लंबे इंतजार को खत्म कर दिया. उन्होंने सिर्फ पदक ही नहीं जीता, बल्कि सीधे गोल्ड अपने नाम किया. दक्षिण कोरिया के लंबे दबदबे के बीच मिली यह जीत भारतीय तीरंदाजी के लिए एक बड़ी उपलब्धि बन गई है.
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