नई दिल्ली, विशेष संवाददाता। पश्चिम एशिया संकट के दौरान भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में सफल रहा है, पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल और गैस की कीमतों में आए उछाल से सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ा है। अप्रैल और मई में कच्चा तेल और गैस के आयात बिल में वृद्धि हुई है। इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर भी पड़ा है। अप्रैल माह में यह इजाफा पिछले वर्ष अप्रैल के मुकाबले करीब साठ फीसदी से अधिक है, जबकि मई माह में पिछले वर्ष के मुकाबले आयात बिल 81 प्रतिशत बढ़ा है। अहम बात यह है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से जहां पूरी दुनिया में आपूर्ति बाधित हुई, वहीं भारत ने मई में वर्ष 2025 के मुकाबले अधिक तेल खरीदा है。
दरअसल, पिछले कुछ वर्षों ने भारत खरीद रणनीति में बदलाव किया है। भारत खाड़ी देशों के साथ अमेरिका, नाइजीरिया और अन्य लैटिन अमेरिकी देशों से भी तेल आयात किया है। पेट्रोलियम योजना और विश्लेषण प्रकोष्ठ (पीपीएसी) के आंकड़ों के मुताबिक मई 2025 में भारत ने 21,329 हजार मीट्रिक टन कच्चा तेल आयात किया था, जबकि इस साल मई में 21,565 हजार मीट्रिक टन कच्चा तेल आयात किया गया।
पश्चिम एशिया संकट शुरू होते ही कच्चे तेल की कीमत बढ़नी शुरू हो गई थी और आपूर्ति बाधित हुई, ऐसे में मार्च 2025 के मुकाबले इस वर्ष मार्च में लगभग तीन हजार मीट्रिक टन कच्चा तेल कम खरीदा, इससे कीमत बढ़ने के बावजूद आयात पर बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ा लेकिन अप्रैल और मई में सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ा है।
मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल माह में भी वर्ष 2025 के मुकाबले इस साल करीब साढ़े चार फीसदी कम कच्चा तेल आयात किया, वहीं आयात बिल में 50 फीसदी से अधिक की वृद्धि हुई है। अप्रैल 25 में 20,986 हजार मीट्रिक टन कच्चा तेल 10.7 अरब डॉलर में खरीदा था, जबकि इस साल अप्रैल में 20175 हजार मीट्रिक टन कच्चा तेल खरीदने के लिए भारत को 16.9 अरब डॉलर चुकाने पड़े।
इसी तरह मई में कच्चे तेल की खरीद पर सरकार को 81 प्रतिशत अधिक कीमत चुकानी पड़ी। मई 25 में कच्चे तेल के लिए भारत ने 10.2 अरब डॉलर खर्च किए थे, इस वर्ष 18.6 अरब डॉलर खर्च किए गए थे। हालांकि, अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध विराम और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के खुलने से जून की शुरुआत से ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई है।
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